ग्राम-सभा पंचायतीराज व्यवस्था का मूल आधार

18.05.2018
 ग्राम-सभा पंचायतीराज व्यवस्था का मूल आधार “लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण” द्वारा लोकतंत्र की जड़ें स्थानीय स्तर पर मजबूत करने के उद्देश्य से 73 वें और 74वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज्य संस्थाओं का गठन किया गया तथा स्थानीय निकायों को महत्वपूर्ण राजनीतिक और आर्थिक अधिकार दिए गए| इसके अंतर्गत ग्रामीण स्थानीय शासन के लिए त्रिस्तरीय व्यवस्था की गई, जो निम्न प्रकार है- 
a) ग्राम पंचायत – ग्राम स्तर पर
 b) पंचायत समिति या जनपद समिती – विकासखंड स्तर पर
 c) ज़िला परिषद- ज़िला स्तर पर 
पंचायती राज के अंतर्गत अब गांव के विकास की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की है। पंचायतें ग्रामीण विकास प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का एक मजबूत माध्यम हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि केवल निर्वाचित सदस्य ही इस जिम्मेदारी को निभायेगें। ग्राम स्तर पर एक मजबूत व सक्रिय ग्रामसभा ही स्थानीय स्वशासन की कल्पना को साकार कर सकती है। ग्रामसभा एक संवैधानिक संस्था है जहां लोग पंचायत प्रतिनिधियों के साथ मिलकर स्थानीय विकास से जुड़ी विभिन्न समस्याओं पर विचार कर सकते है और सबके विकास की कल्पना को साकार रूप दे सकते हैं। स्थानीय स्वशासन तभी मजबूत होगा जब हमारी ग्रामसभा में गांव के हर वर्ग चाहे दलित हों अथवा जनजाति, महिला हो या फिर गरीब, सबकी समान रूप से भागीदारी हो और जो भी योजनायें बनें वे समान रूप से सबके हितों को ध्यान में रखते हुये बनार्इ जायें तथा ग्राम विकास संबन्धी निर्णयों में अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी हो। लेकिन इसके लिए गांव के अंतिम व्यक्ति की सत्ता एवं निर्णय में भागीदारी के लिये ग्रामसभा के प्रत्येक सदस्य को उसके अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति जागरूक किया जाना अत्यंत आवश्यक है।
 यहां इस बात को समझने की आवश्यकता है कि 
1. क्या ग्रामीण समुदाय, चाहे वह महिला है या पुरूष, युवा है या बुजुर्ग अपनी इस जिम्मेदारी को समझता है? 
2. क्या ग्राम विकास संबंधी योजनाओं के नियोजन एवं क्रियान्वयन में अपनी भागीदारी के प्रति वे जागरूक है? 
3. क्या उन्हें मालूम है कि उनकी निष्क्रियता की वजह से कोर्इ सामाजिक न्याय से वंचित रह सकता है?
 ग्रामीणों की इस अनभिज्ञता के कारण ही गांव के कुछ एक ही प्रभावशील या यूं कहें कि ताकतवर लोगों के द्वारा ही ग्रामीण विकास प्रक्रिया चलार्इ जाती है। जब तक ग्राम सभा का प्रत्येक सदस्य पंचायती राज के अन्तर्गत स्थानीय स्वशासन के महत्व व अपनीे भागीदारी के महत्व को नहीं समझेगा, एवं ग्राम विकास के कार्यों के नियोजन एवं क्रियान्वयन में अपनी सक्रिय भूमिका को नहीं निभायेगा, तब तक एक सशक्त पंचायत या गांधी जी के स्थानीय स्वशासन की बात करना महज एक कल्पना है। स्थानीय स्वशासन रूपी इस वृक्ष की जड़ (ग्रामसभा) को जागरूकता रूपी जल से सींच कर उसे नवजीवन देकर गांधी जी के स्वप्न को साकार किया जा सकता। 
*ग्रामसभा सदस्यों के अधिकार एवं जिम्मेदारियॉं* 
 ग्राम सभा को पंचायत व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। पंचायत व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में इसकी अहम् भूमिका हो़ती है। मुख्यत: ग्रामसभा का कार्य ग्राम विकास की विभिन्न योजनाओं, विभिन्न कार्यों का सुगमीकरण करना तथा लाभार्थी चयन को न्यायपूर्ण बनाना है। देश के विभिन्न राज्यों के अधिनियमों में स्पष्ट रूप से ग्रामसभा के कार्यों को परिभाषित किया गया है। उनमें यह भी स्पष्ट है कि पंचायत भी ग्रामसभा के विचारों को महत्व देगी। मुख्यत: ग्रामसभा का कार्य ग्राम विकास की विभिन्न योजनाओं, विभिन्न कार्यों का सुगमी करण करना तथा लाभार्थी चयन को न्याय पूर्ण बनाना है। ग्राम पंचायतों की विभिन्न गतिविधियों पर नियंत्रण, मूल्यांकन एवं मार्गदर्शन की दृष्टि से ग्राम सभाओं को 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के अंतर्गत विशिष्ट अधिकार प्रदान किए गए हैं। ग्रामसभा के कुछ महत्वपूर्ण कार्य तथा अधिकार निम्न प्रकार हैं|
 1. ग्रामसभा सदस्य ग्रामसभा की बैठक में पंचायत द्वारा किये जाने वाले विभिन्न कार्यों की समीक्षा कर सकते हैं, यही नहीं ग्रामसभा पंचायतों की भविष्य की कार्य योजना व उसके क्रियान्वयन पर भी टिप्पणी अथवा सुझाव रख सकती है। ग्राम पंचायत द्वारा पिछले वित्तीय वर्ष की प्रशासनिक और विकास कार्यक्रमों की रिपोर्ट का परीक्षण व अनुमोदन करती है।
 2. पंचायतों के आय व्यय में पारदर्शिता बनाए रखने के लिये ग्रामसभा सदस्य को यह भी अधिकार होता है कि वे निर्धारित समय सीमा के अंतर्गत पंचायत में जाकर पंचायतों के दस्तावेजो को देख सकते हैं| आगामी वित्तीय वर्ष हेतु ग्राम पंचायत द्वारा वार्षिक बजट का परीक्षण अनुमोदन करना भी ग्रामसभा का अधिकार है।
 3. ग्राम सभा का महत्वपूर्ण कार्य ग्राम विकास प्रक्रिया में स्थायी रूप से जुड़े रह कर गांव के विकास व हित के लिये कार्य करना है। ग्राम विकास योजनाओं के नियोजन में लोगों की आवश्यकताओं, उनकी प्राथमिकताओं को महत्व दिलाना तथा उनके क्रियान्वयन में अपना सहयोग देना ग्राम सभा के सदस्यों की प्रथम जिम्मेदारी है।
 4. ग्रामसभा को यह अधिकार है कि वह ग्राम पंचायत द्वारा किये गये विभिन्न ग्राम विकास कार्यों के संदर्भ में किसी भी तरह के संशय, प्रश्न पूछ कर दूर कर सकती है। कौन सा कार्य कब किया गया, कितना कार्य होना बाकी है, कितना पैसा खर्च हुआ, कुल कितना बजट आया था, अगर कार्य पूरा नहीं हुआ तो उसके क्या कारण हैं आदि जानकारी पंचायत से ले सकती है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत ग्राम सभा को विशेष रूप से सामाजिक ऑडिट करने की जिम्मेदारी है|
 5. सामाजिक न्याय व आर्थिक विकास की सभी योजनायें ग्राम पंचायत द्वारा लागू की जायेंगी। अत: विभिन्न ग्राम विकास संम्बन्धी योजनाओं के अंतर्गत लाभार्थी के चयन में ग्रामसभा की एक अभिन्न भूमिका है। प्राथमिकता के आधार पर उचित लाभार्थी का चयन कर उसे सामाजिक न्याय दिलाना भी ग्रामसभा का परम दायित्व है।
 6. नये वर्ष की योजना निर्माण हेतु भी ग्रामसभा अपने सुझाव दे सकती है तथा ग्रामसभा ग्राम पंचायत की नियमित बैठक की भी निगरानी कर सकती है।
 7. ग्राम विकास के लिये ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा श्रमदान करना व धन जुटाने का कार्य भी ग्राम सभा करती है। ग्राम सभा यह भी निगरानी रखती है कि ग्राम पंचायत की बैठक साल में हर महीने नियमित रूप से हो रही हैं या नहीं। साल में दो बार आयोजित होने वाली ग्राम सभा की बैठकों में ग्राम सभा के प्रत्येक सदस्य चाहे वह महिला हो, पुरूष हो, युवक हो बुजुर्ग हो, को भागीदारी करने का अधिकार है। ग्राम पंचायतों को ग्राम सभा के सुझावों पर ध्यान रखते हुये कार्य करना है। 
 8. हमने अक्सर देखा व अनुभव किया है कि ग्राम सभा के सदस्य यानि प्रौढ़ महिला, पुरूष जिन्होंने मत देकर अपने प्रतिनिधि को चुना है अपने अधिकार एंव कर्तव्य के प्रति जागरूक नहीं रहते। जानकारी के अभाव में वे ग्राम विकास में अपनी अहम भूमिका होने के बावजूद भागीदारी नहीं कर पाते। एक सशक्त, सक्रिय व चेतना युक्त ग्राम सभा ही ग्राम पंचायत की सफलता की कुंजी है। 

ग्राम सभा की बैठक व कार्यवाही 

1. ग्राम सभा की बैठकें वर्ष में दो बार होती हैं। एक रबी की फसल के समय (मर्इ-जून) दूसरी खरीफ की फसल के वक्त (नवम्बर-दिसम्बर)। इसके अलावा अगर ग्राम सभा के सदस्य लिखित नोटिस द्वारा आवश्यक बैठक की मांग करते हैं तो प्रधान को ग्राम सभा की बैठक बुलानी पड़ती है।
 2. ग्राम सभा की बैठक में कुल सदस्य संख्या का 1/5 भाग होना जरूरी है; अगर कोरम के अभाव में निरस्त हो जाती है तो अगली बैठक में कोरम की आवश्यकता नहीं होगी। 
3. इस बैठक में ग्राम सभा के सदस्य, पंचायत सदस्य, पंचायत सचिव, खण्ड विकास अधिकारी व विभागों से जुड़े अधिकारी भाग लेंगे।
 4. बैठक ऐसे स्थान पर बुलार्इ जानी चाहिये जहां अधिक से अधिक लोग विशेषकर महिलाएं भागीदारी कर सकें। 
 5. ग्राम सभा की बैठक का एजेण्डे की सूचना कम से कम 15 दिन पूर्व सभी को दी जानी चाहिये व इसकी सूचना सार्वजनिक स्थानों पर लिखित व डुग-डुगी बजवाकर देनी चाहिये।
 6. सुविधा के लिये 1अप्रैल से 31 मार्च तक के एक वर्ष को एक वित्तीय वर्ष माना गया है। ग्राम प्रधान पिछले वर्ष की कार्यवाही सबके सामने रखेगी। उस पर विचार होगा, पुष्टि होने पर प्रधान हस्ताक्षर करेगा।
 7. पिछली बैठक के बाद का हिसाब तथा ग्राम पंचायत के खातों का विवरण सभा को दिया जायेगा। पिछले वर्ष के ग्राम विकास के कार्यक्रम तथा आने वाले वर्ष के विकास कार्यक्रमों के प्रस्ताव अन्य कोर्इ जरूरी विषय हो तो उस पर विचार किया जायेगा। 
8. ग्राम सभा का यह कर्तव्य है कि वह ग्राम सभा की बैठकों में उन्हीं योजनाओं व कार्यक्रमों के प्रस्ताव लाए जिनकी गांव में अत्यधिक आवश्यकता है व जिससे अधिक से अधिक लोगों को लाभ मिल सकता है।
 9. जब ग्राम सभा में एक से अधिक गांव होते हैं तो खुली बैठक में प्रस्ताव पारित करने पर बहस के समय काफी हल्ला होता है। सबसे अच्छा यह रहेगा कि हर गांव ग्राम सभा की आने वाली बैठक से पूर्व ही अपने अपने गांव के लोगों की एक बैठक कर ग्राम सभा की बैठक में रखे जाने वाले कार्यक्रमों पर चर्चा कर लें व सर्व-सहमति से प्राथमिकता के आधार पर कार्यक्रमों को सूचीबद्व कर प्रस्ताव बना लें और बैठक के दिन प्रस्तावित करें। "एक आदर्श पंचायत वही पंचायत हो सकती है, जिसमें गांव की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता हो। एक आदर्श ग्रामसभा वही ग्रामसभा हो सकती है, जिसके सदस्यों में ग्राम विकास और इससे जुड़ी योजनाओं के नियोजन तथा कार्यान्वयन में भागीदारी के प्रति संवेदनशीलता हो।’’ इसके अतिरिक्त गांव सुरक्षा, बाल विवाह, दहेज, छूआछूत जैसे विभिन्न सामाजिक मुद्दों को भी बैठक में उठा सकते हैं। उनसे संबन्धित किसी तरह के निर्णय में भी उनकी भागीदारी की अनिवार्यता स्वत: बन जाती है। यह बात पूर्ण रूप से स्पष्ट है कि ग्रामसभा पंचायती राज व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसलिये ग्रामसभा के प्रत्येक सदस्य को जागरूक रहकर ग्राम विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में अपना पूर्ण सहयोग देना चाहिये। ग्राम सभा सदस्यों की भागीदारी बढ़ाने हेतु कुछ कदम 1. ग्रामसभा सदस्यों की ग्रामसभा की बैठक में भागीदारी न लेने के कारण ही ग्राम स्तरीय नियोजन में उनकी भागीदारी नहीं हो पाती है। अत: ग्रामसभा के कार्यों के प्रति उनकी विचारधारा को व्यापक रूप से एक नर्इ दिशा देने की आवश्यकता है ताकि सभी ग्रामसभा सदस्यों की ग्रामसभा बैठक के प्रति जागरूकता तथा रूचि में बढ़े। बैठक में पूर्ण भागीदारी के लिये ग्रामसभा सदस्यों को अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना होगा। ग्रामसभा को मजबूत करने में पंचायत प्रतिनिधि सामुदायिक व स्वयं सेवी संगठन एक अहम भूमिका निभा सकते हैं। 2. ग्रामसभा के हर सदस्य की बैठक में भागीदारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिये गांव के सार्वजनिक स्थलों, छानियों, (पशुशाला) प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों, आंगनबाड़ी केन्द्रों, ग्रामीण सूचना केन्द्र, पंचायत चौक, पंधेरों, विद्यालयों आदि में बैठक की सूचना चिपकाना चाहिए। 3. गांव के सम्पूर्ण विकास के लिये महिला की भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है जितनी कि पुरूष की। अत: महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने हेतु घर के पुरूषों को समझाना जरूरी है। बैठक का समय भी ऐसा रखना चाहिये कि उनकी ज्यादा से ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। 4. बैठक से पूर्व प्रभात फेरी के माध्यम से ग्रामसभा सदस्यों को बैठक की सूचना देना तथा बैठक में भागीदारी के प्रति उन्हें जागरूक करना चाहिए। ग्राम सभा की बैठक ऐसे स्थान पर हो जहां आने में सुविधा हो और गांव के सभी लोग आ सकें। 5. ग्रामसभा की बैठक के महत्व के प्रति जागरूकता हेतु पदयात्रा अथवा अभियान चलाना व निरन्तर सूचना का प्रसार करना चाहिए। इस अभियान में गांव के सेवामुक्त शिक्षक, सरकारी कर्मचारियों को भी जोड़ना एक महत्वपूर्ण कार्य हो सकता है। बच्चों के माध्यम से ग्रामसभा बैठक पर नाटक/नुक्कड़ करवाकर आदर्श और निष्क्रिय ग्रामसभा के महत्व एवं हानि का बोध कराना चाहिए। *पंचायत प्रतिनिधियों की ग्रामसभा के प्रति जवाबदेही* 1. ग्रामसभा तथा ग्राम पंचायत एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। ग्रामसभा ग्राम पंचायत के साथ एक सहयोगी और एक मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकती है। लेकिन पंचायत प्रतिनिधियों की भी उसके प्रति कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं जिन्हें निभाने से गांव विकास की ओर बढ़ सकता है। बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनके संदर्भ में पंचायत को ग्रामसभा के प्रति जवाबदेह होना पड़ता है। 2. ग्रामविकास सम्बन्धी जो भी योजना गांव में आए, उसकी सारी जानकारी (बजट व कार्यक्रम को लेकर) पंचायत के सूचना पट पर लग जानी चाहिये ताकि गांव के सभी लोगों को इसका पता चल सके। 3. गांव के लिये जब योजना बने तो ग्रामसभा के सभी सदस्यों के साथ विचार विमर्श के बाद बने। सबकी निर्णय लेने में भागीदारी ली जाये । 4. ग्रामसभा के सदस्यों को बैठक की सूचना समय पर देना तथा सूचना को सार्वजनिक स्थान पर लगाना ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी है। 5. ग्रामसभा जो प्रस्ताव बनाये अथवा निर्णय ले, पंचायत प्रतिनिधियों को उसे सम्मान देना होगा। 6. ग्राम विकास योजना के अन्तर्गत अगर लाभार्थी का चयन करना है तो सब सदस्यों के सामने, प्राथमिकता के आधार पर तथा सर्वसम्मति से हो। 7. पंचायत प्रतिनिधियों को चाहिये कि निर्णय प्रक्रिया में मुट्ठी भर ताकतवर या प्रभावशाली लोगों को नहीं अपितु ग्रामसभा के प्रत्येक सदस्य को शामिल करें। भागीदारी निभाने हेतु उन्हें प्रेरित करने के लिये स्वयं आगे आयें, तभी दोनों सच्चे अर्थों में एक दूसरे के पूरक बनेंगे। ग्राम पंचायत समितियों में ग्रामसभा की भूमिका गांव के समुचित विकास हेतु पंचायत स्तर पर विभिन्न कार्यों के संपादन हेतु विभिन्न समितियों के गठन का प्रावधान है जैसे विकास एवं कल्याण समिति, शिक्षा समिति, आदि। मूल्यांकन की दृष्टि से ग्राम पंचायत की विभिन्न समितियां ग्रामसभा के प्रति जवाबदेह होती हैं। ग्रामसभा को अधिकार है कि वह उनके कार्यों की निगरानी करे तथा उनके कार्यों का मूल्यांकन करे। ग्रामसभा, पंचायत समितियों के कार्यों की निगरानी हेतु एक निगरानी कर्ता (वाच-डाग) का काम कर सकती है तो एक सहयोगी की भूमिका भी निभा सकती है। वह एक मूल्यांकन कर्ता की भूमिका निभा सकती है तो एक मार्गदर्शक भी बन सकती है। ग्रामसभा- स्थानीय स्वशासन की आधारशिला ग्रामसभा एक ऐसी आधार-भूत इकार्इ है जिसमें उस ग्रामसभा के सभी सदस्य नि:संकोच आकर गांव से जुड़ी विभिन्न समस्याओं तथा मुद्दों पर विचार विमर्श कर सकते हैं। ग्राम सभा के सभी लोग सहभागिता से गांव के विकास के लिये योजना बना सकते हैं। पंचायत में चाहे कार्यक्रम का नियोजन हो या क्रियान्वयन या पूर्ण हुये कार्यों का मूल्यांकन एवं निगरानी, कोर्इ भी कार्य लोगों की सहभागिता के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। अत: पंचायत को सफल बनाने के लिये सभी कार्यों व निर्णय स्तर पर सबकी भागीदारी व सहयोग को शामिल करना अतिआवश्यक है। सभी की सहभागिता से जहां एक ओर पंचायत संगठित व मजबूत होगी वहीं दूसरी ओर पंचायत पर आम लोगों का विश्वास भी बढ़ेगा। ग्राम विकास कर प्रक्रिया में ग्रामवासियों की सक्रिय सहभागिता के बिना ग्राम स्वराज का सपना अधूरा ही रहेगा। अत: ग्राम ग्रामवासियों को ग्राम के विकास व सशक्तिकरण के प्रति जागरूक करना होगा तभी एक सशक्त ग्रामसभा का निर्माण होगा और गांव विकास की ओर बढ़ सकेगा। डॉ. सत्यपाल सिंह मीना, ज्वॉइंट कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स इंदौर ।‍

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